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JCNC Sunday Adult Swadhyaya continuing on January 31 st , 10AM via ZOOM

posted Aug 4, 2021, 2:26 PM by JCNC Technology
Jai Jinendra,
 
We trust you and your loved ones are safe during this challenging pandemic.
 
As you all know, the JCNC Sunday Adult Swadhyaya usually conducted on the 2nd floor in Sthanak/Bhakti Area is continuing via Zoom Video Conference from 10 to 11:15 AM on the coming Sunday, January 31 st , and every 1st, 3rd and 5th Sunday of every month consistent with Senior Jaina Shala 2020-21 Schedule.
 
The pdf file of the last swadhyaya (01/17/2021) on Yogdrashti Samuchchay can be accessed via the following link:
https://drive.google.com/file/d/1xZmoUWc7VDRXBB42FUR1flBNe_FWiF5Y/view?usp=sharing
 
Zoom Conference Call Information:

Topic: JCNC Adult Swadhyaya - आचार्य हरिभद्रसूरी रचित "योगदृष्टि समुच्चय"
Time: Jan 31 st , 2021 10:00 AM Pacific Time (US and Canada)

FYI, February Swadhyaya Sessions are: Feb 7 and Feb 21 st  at 10 am – please mark your calendar.

Join Zoom Meeting: https://zoom.us/j/97573070208?pwd=c2VEellNMjN3YVhRSXBMK2xEcDl5QT09
Meeting ID: 975 7307 0208
Passcode: 510510
 
Brief Description of the Swadhyaya Topic:
हमारे स्वाध्याय का विषय आचार्य हरिभद्रसूरी रचित "योगदृष्टि समुच्चय" है। उनकी रचनाओंमें “योगदृष्टि समुच्चय” जैनयोग का अन्यन्त
महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ संस्कृत में है और उसमे २२८ श्लोक है। आचार्य हरिभद्र ने आत्मा के विकास-क्रम को योग पद्धति पर एक
नए रूप में विश्लेषित किया है। इस ग्रन्थ में मित्रा, तारा, बला, दीप्रा, स्थिरा, कान्ता, प्रभा और परा - इन आठयोगदृष्टिओं का विस्तृत
वर्णन है। इसमें योग-साधकों के उपकार हेतु उन्होंने इच्छायोग, शास्त्रयोगऔर सामर्थ्ययोग स्वरूप व्यक्त किया है और अंत में योग के
अधिकारी के रूप में गोत्रयोगी, कुलयोगी, प्रवृत्तचक्रयोगी और सिद्धयोगी - इन चार योगियों का वर्णन किया है। आचार्यहरिभद्र ने इस
ग्रन्थ पर १०० पद्य प्रमाण वृति लिखी है जो ११७५ श्लोक परिमाण है।
 
Be safe, and please take extra measures of protection.
 
Best regards & Pranaam,
 
Harendra Shah
Kamlesh Mehta
Cell: (408) 839-8996
 
श्री बृहत्कल्पभाष्य में कहा है: “नवि अत्थि न वि अ होही, सज्झाय समं तवो कम्मं" अर्थात "स्वाध्याय के समान दूसरा तप न
अतीत में था, न कोई वर्तमान में है और न भविष्य में होगा। "
तप के बाह्य (६) और अभ्यन्तर (६) भेद है और "स्वाध्याय" अभ्यन्तर तप है।
"ज्ञानक्रियाभ्याममोक्षः" अर्थात "ज्ञान और क्रिया (आचरण) के सम्यग संयोग से मोक्ष प्राप्ति है।"

Hetan Shah & Ravi Shah
VP & Co-VP Public Relations & Membership

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JCNC Technology,
Aug 4, 2021, 2:26 PM
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